कितने सावन बीत गये,
गरज घटा फिर छायी।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥
पर्वत के उस पार,
कभी, ये बादल थे गहराये।
अमराई की बैठ सिला पर,
कितने नगमेँ संग तेरे गाये।
बिखर गये सपने वे सारे,
बस, हाथ लगी रुसवाई।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥
बादल के आँचल मेँ छुप-छुप,
क्योँ चँदा आग लगाये।
आँख मिचौली,
अब ना भाती,
बाँध सबर का टूट चुका है,
यह दर्द सहा न जाये॥
काहे जान जलाती है,
पागल अब भी गाती है,
ओ मदहोश पवन पुरवाई।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥
गीली आँखोँ से,
दर्दभरे ये रिस्ते किसने जोड़े।
दिया तनहाई का आलम गहरा,
तेरे मिलन के पल थे थोड़े॥
अब जाना है,
क्योँ जलता है,
शमाँ पर परवाना।
दर्द विदाई का सहना बदतर,
बेहतर है मर जाना॥
जाने क्योँ दिल बहका है,
फिर महकी हैँ अमराई।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥
गरज घटा फिर छायी।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥
पर्वत के उस पार,
कभी, ये बादल थे गहराये।
अमराई की बैठ सिला पर,
कितने नगमेँ संग तेरे गाये।
बिखर गये सपने वे सारे,
बस, हाथ लगी रुसवाई।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥
बादल के आँचल मेँ छुप-छुप,
क्योँ चँदा आग लगाये।
आँख मिचौली,
अब ना भाती,
बाँध सबर का टूट चुका है,
यह दर्द सहा न जाये॥
काहे जान जलाती है,
पागल अब भी गाती है,
ओ मदहोश पवन पुरवाई।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥
गीली आँखोँ से,
दर्दभरे ये रिस्ते किसने जोड़े।
दिया तनहाई का आलम गहरा,
तेरे मिलन के पल थे थोड़े॥
अब जाना है,
क्योँ जलता है,
शमाँ पर परवाना।
दर्द विदाई का सहना बदतर,
बेहतर है मर जाना॥
जाने क्योँ दिल बहका है,
फिर महकी हैँ अमराई।
मेरी दर्दभरी यादोँ मेँ,
ना आना तु हरजाई॥

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