रोहिड़ा के फूलों ने,
फिर बैसाख की याद दिलाई है,
लू के झोंकों में,
पसीने से तर बतर ,
उस बकरी के मेमने को प्यार से सहलाते हुए,
तुम्ही ने तो कहा था,
गर्म बालू के टीलों में,
मकरंद का मिठास लिए,
इन केसरिया कुसुमल फूलों के तरह,
मेरे प्यार की मिठास सदा तुम्हारे साथ रहेगी।
अब भी हर बैसाख में तपते हैं ये टीले,
हर साल,
रोहिड़ा के फूलों का कुसुमल रंग,
इन टीलों में,
जीवन की आस्था का रंग भरने,
मीठे मकरंद के साथ,
लहलहाता है।
बकरी का बच्चा,
इसी रोहिड़ा के पास,
फिर प्यार से पूंछ हिला रहा है,
हां,
सिर्फ तुम नहीं हो,
बड़ी निर्ममता से,
यह मंजर,
मुझे तुम्हारे प्यार की मिठास की याद दिलाता है।