Thursday, September 27, 2018

पपीहा रे ओ रे पपीहा...

पपीहा रे,
ओ रे पपीहा!
तु पीव पीव काहे बोले।
यह अनबुझ प्यास बुझे ना पागल,
क्योँ विरहा के रंग घोले॥
युग बदले,
पर, रीत न बदली।
पागल दिल की प्रीत न बदली॥
क्योँ रो रो जी हलकान करे तु।
मिलन की काहे तान भरे तु॥
पंछी, जो दिल प्रीत की डगर चले,
वे जल कर हुये फफोले।
यह अनबुझ प्यास बुझे ना पागल,
क्योँ विरहा के रंग घोले॥

शायद तुझको याद नहीँ,
सोहिनी और महीवाल सखे।
यहाँ जिन्दा जलाया मजनूँ को,
राँझा हुआ बदहाल सखे॥
काहे पागल, तु चिल्लाये।
जीवन भर का रोग लगाये॥
इस ठंडी आग मेँ जल जल मर गये,
दीवानोँ के टोले।
पपीहा रे,
ओ रे पपीहा!
तू पीव, पीव, काहे बोले॥

सोने दे मुझको पागल तु,
मैँ भी हूँ दीवाना।
जग से रुठा,
खुद से टूटा,
एक घायल परवाना॥
अब भी आश लगाये बैठा,
विश्वास ने उनसे डोले।
यह अनबुझ प्यास बुझे ना पागल,
क्योँ विरहा के रंग घोले॥

पपीहा रे,
ओ रे पपीहा!
तु पीव, पीव, काहे बोले॥
॰ प्यारेलाल भाम्बू ॰

No comments:

Post a Comment